शंकरचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के मामले में हाई कोर्ट के अधिवक्ता गौरव द्विवेदी ने मुख्य न्यायाधीश के समक्ष लेटर पिटीशन दाखिल कर 18 जनवरी मौनी अमावस्या पर हुई घटना की सीबीआई से जांच करवाने और प्रयागराज कमिश्नर, डीएम, पुलिस कमिश्नर तथा मेला अधिकारी को निलंबित करने का आदेश देने की मांग की है।
याचिका पर नाबालिग ब्राह्मण बटुकों की पुलिस हिरासत में रख कर उनसे मारपीट करने वाले पुलिसकर्मियों पर मुकदमा दर्ज करने की भी मांग की गई है।
याची का कहना है कि प्रयागराज में लगने वाला माघ मेला सनातन धर्म का एक पवित्र उत्सव है। इसमें मौनी अमावस्या का स्नान सबसे महत्वपूर्ण हैं। इस बार 18 जनवरी को मौनी अमावस्या के मौके पर शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जब संगम स्नान के लिए अपने शिष्यों के साथ पालकी से जा रहे तभी प्रशासन और पुलिस के अधिकारियों ने उनको जबरदस्त पालकी से उतार दिया और और पैदल स्नान जा कर स्नान करने के लिए कहा।
इतना ही नहीं शंकराचार्य के साथ चल रहे 11 से 14 वर्ष के ब्राह्मण बटुकों को हिरासत में लेकर मारा पीटा गया और उनकी शिखा (चोटी) पकड़ कर घसीटा गया। याची का कहना है कि नाबालिग बटुकों से ऐसी ज्यादती जुवेनाइल जस्टिस एंड प्रोटेक्शन एक्ट के प्रावधानों का उल्लंघन है और दंडनीय अपराध है। एक्ट में नाबालिग बच्चों की सुरक्षा और उनकी गरिमा की गारंटी दी गई है। बटुकों की शिखा खींचना सनातन धर्म को अपमानित करना है। यह बच्चों के साथ क्रूरता है।
याची का कहना है कि प्रशासन ने सुप्रीम कोर्ट में लंबित एक मामले का हवाला देकर उनके शंकराचार्य के पद पर विराजमान होने पर सवाल उठाए हैं। शंकराचार्य की नियुक्ति की तय धार्मिक प्रकिया है, जो अखाड़ों और काशी विद्वत परिषद के माध्यम से संपन्न होती है। प्रशासन को उस पर सवाल उठाने का अधिकार नहीं है।
याचिका में कहा गया है कि पुलिस और प्रशासन की कार्यवाही से कानून के समक्ष समानता, शांति पूर्ण सभा करने और विचरण करने तथा धार्मिक स्वतंत्रता के मौलिक अधिकारों का हनन हुआ है। धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा के लिए उचित आदेश देने की याचिका में मांग की गई है।
(जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं और कानूनी मामलों के जानकार हैं।)